एक दौर था जब मोबाइल फोन हाथ से छूटकर गिरता था, तो उसकी बैटरी और बैक कवर अलग छिटक जाते थे। हम उन्हें वापस जोड़ते थे और फोन फिर से चलने लगता था। पॉलिकार्बोनेट या प्लास्टिक बॉडी वाले वे फोन बेहद मजबूत और किफायती हुआ करते थे। लेकिन आज प्रीमियम लुक और 'फ्लैगशिप फील' की अंधी दौड़ में कंपनियों ने टिकाऊ प्लास्टिक स्मार्टफोन को पूरी तरह गायब कर दिया है। अब उनकी जगह बेहद नाजुक और महंगे ग्लास बैक पैनल्स ने ले ली है। सुंदरता की इस भारी कीमत ने न सिर्फ स्मार्टफोन की मरम्मत को जेब पर भारी बना दिया है, बल्कि ई-कचरे की समस्या को भी गंभीर रूप से बढ़ा दिया है।
शुरुआती दौर के एंड्रॉइड और लूमिया सीरीज में मजबूत पॉलिकार्बोनेट का बेहतरीन इस्तेमाल होता था। यह मटीरियल न सिर्फ हल्का था, बल्कि इस पर खरोंच आना या इसका टूटना काफी मुश्किल था। लेकिन धीरे-धीरे टेक कंपनियों ने 'प्रीमियम मटीरियल' का जाल बुना। एल्युमीनियम और फिर गोरिल्ला ग्लास को स्टेटस सिंबल बनाकर पेश किया गया। जब एक-दो बड़ी कंपनियों ने अपने फोन के पीछे कांच लगाना शुरू किया, तो पूरी इंडस्ट्री उसी राह पर चल पड़ी। नतीजतन, टिकाऊपन पर लुक्स और फील को प्राथमिकता दी जाने लगी।
आज हालत यह है कि हम एक महंगे और खूबसूरत कांच के फोन को खरीदने के ठीक बाद उसे एक सस्ते प्लास्टिक कवर में छुपाने के लिए मजबूर हैं।
स्मार्टफोन में ग्लास बैक देने के पीछे कंपनियों ने वायरलेस चार्जिंग का तर्क दिया। हालांकि, प्लास्टिक स्मार्टफोन में भी वायरलेस चार्जिंग दी जा सकती थी। कांच की वजह से ग्राहकों पर कई तरह के वित्तीय और व्यावहारिक प्रभाव पड़े हैं:
क्या ग्राहक अब केवल दिखावे से ऊब चुके हैं? टेक कम्युनिटी में अब धीरे-धीरे यह बहस छिड़ रही है कि 'मैट-फिनिश' पॉलिकार्बोनेट या रीसाइकिल्ड मटीरियल वाले प्लास्टिक स्मार्टफोन को फिर से फ्लैगशिप सेगमेंट में लाया जाना चाहिए। इको-फ्रेंडली और ड्यूरेबल डिजाइन ही भविष्य की असली जरूरत है। अगर कंपनियां फिर से मजबूती को प्राथमिकता दें, तो यूजर बिना किसी बैक कवर के अपने फोन को बेफिक्र इस्तेमाल कर सकेंगे।
क्या आप भी अपने पुराने मजबूत और बिना कवर वाले फोन को मिस करते हैं? हमें कमेंट में जरूर बताएं!









